प्रकृति "परी"
बैरन कहू या तुझें संगिनी!
लो आई नहा के " प्रकृति परी",
कभी सूखे पेड़ो को जीवन दिया
कभी बस्तिया तूने वीरान की ,
कभी उपवनो में खुशबु सी उड़ी
कभी गुल के मालिक पे बिजली गिरी,
वो मद्धम महक वो सुवासित हवा
पहली बूंदो की सारी है जादूगरी ,
जो घिरती है काली घटा बावरी
तो नदिया तड़पती है "मुक्तावलि ",
कही बांध टूटे कहि घर बहे
कही सुखी नदिया भी भरने लगी ,
कही अग्निवर्षा कहि जल भरी
कही मुक्त मर्यादा को तू लांघती ,
तुझे सन्तुलित कर सके जो कभी
कृष्णा!! बिना कोई होगा नही ,
कभी मौत! बन कर डराती है तू
कभी माँ से कोमल बरसती हुयी।
shikhanaari
बैरन कहू या तुझें संगिनी!
लो आई नहा के " प्रकृति परी",
कभी सूखे पेड़ो को जीवन दिया
कभी बस्तिया तूने वीरान की ,
कभी उपवनो में खुशबु सी उड़ी
कभी गुल के मालिक पे बिजली गिरी,
वो मद्धम महक वो सुवासित हवा
पहली बूंदो की सारी है जादूगरी ,
जो घिरती है काली घटा बावरी
तो नदिया तड़पती है "मुक्तावलि ",
कही बांध टूटे कहि घर बहे
कही सुखी नदिया भी भरने लगी ,
कही अग्निवर्षा कहि जल भरी
कही मुक्त मर्यादा को तू लांघती ,
तुझे सन्तुलित कर सके जो कभी
कृष्णा!! बिना कोई होगा नही ,
कभी मौत! बन कर डराती है तू
कभी माँ से कोमल बरसती हुयी।
shikhanaari
