मैं जीवन को तरसती हूँ।
रिश्तो के इन धागों में ,
उलझतीहूँ निकलती हूँ।
मैं जा कर चाँद तारो तक ,
गिरती और संभालती हूँ।
मैं किस्मत की लकीरो पर ,
दौड़ती हूँ फिसलती हूँ।
मैं रह कर भी समुन्दर में ,
तृप्ति जल को तरसतीहूँ।
मैं मेघो की गर्जना हूँ ,
या सृष्टि की वर्जना हूँ।
मैं पत्थर हु या पायस हूँ ,
या दावानल दहकती हूँ
जरा पहचान दो मेरी ,
पनी हस्ती को तरसती हूँ।
माध्यम हु मैं विधना का ,
या बस एक करुण अभिव्यक्ति हूँ
