मैने देखें है रंग सभी किस रंग की बात करू मै अभी
हसँती भी हू ,और रोती भी ,खाती भी हूँ और सोती भी,
जीती भी हूँ और मरती भी हर रंग मे खुद को रंगती भी
कभी हूँ उदास कभी मर्म हास कभी तन्हाई में खोती सी,
ऐसा भी है जब होंट हँसे आँखे हो लेकिन रोती सी
कभी पूर्ण हुयी, कभी फिर खाली कभी रंग रंग कभी ,बस काली !
कभी मन मे इन्द्रधनुष मेरे ,कभी अहसासों से वो खाली
अभिव्यक्त् करू अपनी पीड़ा कभी, हंसती और इठलाती भी ,
मै एक पहेली सी हूँ बस।
पतझड़ उपवन मे माली सी। .......
शिखानारी
शिखानारी
