आवेग
मैं हूँ आशंकित बहुत मगर,
कहो! क्या आवेग भावना होती है,
जब मिलते है दो जिस्म यहां
क्या तभी ये "प्रेम प्रार्थना" होती है,
क्या प्रेम मिलन दो जिस्मो का ,क्या
ये माटी की ये देह यँहा ही, प्रेम कामना होती है ,
क्या ह्रदयहीन! का "व्यभिचार"
भी प्रेम उपासना होती है ,
अविकसित कोमल फूलो को
डाली से अलग -थलग करना,
क्या सिर्फ जिस्म को पाने को,
"अमर्यादित" रिश्ते रखना
क्या प्रेम- प्रेंम कह कर,
प्रेम को अपमानित करना
अपनी कलुषित अमानुषिक ,
इच्छाये पूरी करना
बोलो ना प्यार यही है क्या ?,
बस जिस्मो की पूजा करना।
