पावस यूँ बरसना ना
हौले से चले जाना
वो दरवाज़ा मुहब्बत का
बूँदों से ना खटकाना
मैं रेगिस्तान का राही
ना मृगतृष्णा में तरसाना
पवन की ये शरारत भी
मेरी ज़ुल्फ़ों को सज़ा ही है
मेरी आँखों के जादू से
क़ाफ़िलों को ना भटकाना
🙏🌹Shikha Naari