चाहा तो था की तुमको नेह के बंधन में बाँधूँगी
मैं धागों से आरज़ू के घरोन्दा अपना सजा लूँगी,
मैं पलकों से बूहारूँगी आपकी राहें मुहब्बत को
अपनी पाकीज़गी से इश्क़ के दीपक जलालूँगी,
मगर जब पास आए तो ग़ुमां ये हो गया हमको
नही गुल मुहब्बत का तुम तो कोई तलवार दोधारी ,
चलो अब दिल करके पत्थर तलवार में धार डालूँगी
बचाना ख़ुद को वरना तुमको वफ़ा से चीर डालूँगी।
🙏shikhanaariI