कविता
दोस्त मुझे कविता कहते है ,मुझको खुद रचते रहते है
छोटी बड़ी बात कोई हो ,दुःख सुखका अहसास कोई हो ,
शब्दों के फंदो में नए -नए आरोप लगा कर ,नए दर्द बुनते रहते है
कविता की दुशालाओ से ,झूठे जज्बातो को ढकते रहते है ,
कभी हाथ ले कर हाथो में ,बे मतलब हसते रहते है
और कभी दुशाला में छिप कर ,शब्दवार करते रहते है ,
मैं निर्मल मन समझ ना पाऊं ,हाथ पकड़ बस बढ़ती जाँऊ
खुद ही दे पतवार हाथ में ,कश्ती में बैठा देते है ,
खुद ही फिर कश्ती को ,तूफान के सम्मुख करते है
ताउम्र हाथ में जाम उठा फिर,मातम भी करते रहते है ,
हम सबसे डरते रहते है ,और अब ,खुद-खुद पे कविता कहते है
🙏शिखा नारी ❤️💕❤️