हसरते
दिल मेरा अब एक किला,जहाँ अब दरवाज़े नहीं दिवार है
अश्क़ मोती नहीं ,ना नयना ही अब कटार है
रूह की ये सजा की, ये जिस्म कारगर है,
दिल का कागज़ जल गया ,दर्द से तक़रार है
दिल से रूह की दुश्मनी ,कैसी ये मेरी यलगार है ,
दिल से रूह की दुश्मनी ,कैसी ये मेरी यलगार है ,
इतना तरस ,इतनी दया भी अच्छी नहीं है दोस्तों ,
दूर ही रहना की मेरे ,लफ्ज़ अब तलवार है
की है मुहब्बत की ,आज़माइश हम ने भी बहुत
हो गयी अब नफरते ,उस लफ्ज़ से जो प्यार है।
.................................शिखा