पीठ में खंजर चुभा कर आह भरते है ,
खून मेरा देख कर वो चीख! पड़ते है,
बन्द करते है अपनी वो आंखे,
खुद के दिए जख्म की गहरायी देख कर,
दुश्मनो के काँधे पे रख कर सर,
उफ़ ! देखो कैसे वो सिसक पड़ते है।
हमको पर देते नही इज़ाज़त दर्द !में आह" भरने की ,
उस पे नुक्ता ये की हमारे आँसूओ से वो सिहर उठते है ,
लोग पूछते हैं उनसे खुद हमारे जख्म की वजह
वो बताते हैं, की हम नाज़ुक है !यूँही आह भरते हैं ,
किसको दिखाए जख्मी दिल किसका नाम ले ?
वो जानते है खूब हम उनसे प्यार करते है ,
हम भी बस चुप- चाप यूँही मुस्कुराते है,
वह मेरे कातिल इसी बहाने, सौ- सौ बार मेरा नाम जपते है,
लोग शातिर है समझ लेंगे ये दर्दे दिल,
ये हमारे मासूम अजनबी क़ातिल
हमसे कुछ ना कुछ
राब्ता" तो रखते है
शिखानारी
शिखानारी
